सफर
सफ़र
"गुजरा है कैसा ये सफर न पूछिए,
रहता कहाँ हूँ मैं मेरा घर न पूछिए,
उजड़े हुए मकाँ हैं उजड़ीं हैं बस्तियाँ,
वीरान हुआ कैसे ये शहर न पूछिए,
खबर नहीं जो अखबार में छप जाऊँ,
जो बने खबर उनकी खबर न पूछिए,
देता नहीं है साथ कोई बुरे वक्त में,
कैसे खुदा से हुआ मैं बशर न पूछिए,
हो कोई हमसाया ये जरूरी तो नहीं,
तनहाई के मौज का हुनर न पूछिए,
राज़ी न था दोस्त कोई साथ चलने को,
बिछड़े जो मिलकर हमसफर न पूछिए,
बरसों पहले था अब नज़र नहीं आता,
दफ़न हुआ मैं या शज़र न पूछिए,
वक़्त बिस्तर पे था तो ख़्वाब बुन लिया,
बिखरा है ख़्वाब या 'अख़्तर' न पूछिए,
-"अभिषेक अख्तर"
"गुजरा है कैसा ये सफर न पूछिए,
रहता कहाँ हूँ मैं मेरा घर न पूछिए,
उजड़े हुए मकाँ हैं उजड़ीं हैं बस्तियाँ,
वीरान हुआ कैसे ये शहर न पूछिए,
खबर नहीं जो अखबार में छप जाऊँ,
जो बने खबर उनकी खबर न पूछिए,
देता नहीं है साथ कोई बुरे वक्त में,
कैसे खुदा से हुआ मैं बशर न पूछिए,
हो कोई हमसाया ये जरूरी तो नहीं,
तनहाई के मौज का हुनर न पूछिए,
राज़ी न था दोस्त कोई साथ चलने को,
बिछड़े जो मिलकर हमसफर न पूछिए,
बरसों पहले था अब नज़र नहीं आता,
दफ़न हुआ मैं या शज़र न पूछिए,
वक़्त बिस्तर पे था तो ख़्वाब बुन लिया,
बिखरा है ख़्वाब या 'अख़्तर' न पूछिए,
-"अभिषेक अख्तर"
Comments
Post a Comment